सरकार राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति बनाकर इस क्षेत्र पर खर्च में जीडीपी
का प्रतिशत बढ़ाने का इरादा जता चुकी है, वहीं आगामी एक फरवरी को आने वाले
बजट में स्वास्थ्य सेक्टर सरकार से आवंटन बढ़ाने के साथ-साथ इसे जीएसटी के
दायरे में लाने जैसी मांगें कर रहा है।
संसद
की प्राक्कलन समिति (एस्टीमेट्स कमेटी) भी गत दिसंबर में संसद में पेश
अपनी एक रिपोर्ट में स्वास्थ्य देखभाल पर सरकारी व्यय को जीडीपी के 1.5
प्रतिशत से बढ़ाने की जरूरत बता चुकी है।
भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी
की अध्यक्षता वाली समिति ने ‘देश में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य
परिचर्या’ विषय पर अपनी रिपोर्ट में कहा कि स्वास्थ्य देखभाल पर जीडीपी के
प्रतिशत के रूप में सरकारी व्यय 2007-08 के 1.27 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष
2016-17 के दौरान 1.5 प्रतिशत हो गया है लेकिन इस व्यय में और अधिक वृद्धि
की आवश्यकता है, ताकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति और सतत विकास लक्ष्यों की
प्राप्ति की जा सके।
सरकार वर्ष 2030
तक सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए स्वस्थ जीवन सुनिश्चित करने के लिए सतत
विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करने की प्रतिबद्धता जता चुकी है। इसी
उद्देश्य के साथ सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 बनाई है जिसका
लक्ष्य किसी भी व्यक्ति को वित्तीय बाधाओं का सामना किये बिना अच्छी
गुणवत्ता की स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं तथा विश्वव्यापी पहुंच को उपलब्ध
कराना है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 की मुख्य बातों में अन्य बातों के
साथ समयबद्ध तरीके से सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को सकल घरेलू उत्पाद
(जीडीपी) का 2.5 प्रतिशत करना भी शामिल है।
पिछले
दस साल में सरकार (केंद्र और राज्य) दोनों ने स्वास्थ्य देखभाल पर जीडीपी
के 1.2 प्रतिशत से लेकर 1.5 प्रतिशत तक खर्च किया है। अब इसे ढाई प्रतिशत
करने का लक्ष्य है। स्वास्थ्य पर आवंटन और खर्च बढ़ाने की जरूरत बताते हुए
निजी क्षेत्र के लोग इस क्षेत्र को जीएसटी के दायरे में लाने जैसी मांग भी
कर रहे हैं।
इंडस हेल्थ प्लस कंपनी के
अमोल नाइकावाडी ने स्वास्थ्य सेवाओं को बहुत कम दर के साथ जीएसटी में शामिल
करने की वकालत की। उन्होंने कहा कि इससे स्वास्थ्य क्षेत्र में सभी लेनदेन
कर प्रणाली में दिखाई देंगे और सरकार को भी राजस्व मिलेगा। इसके साथ
चिकित्सा संस्थानों को इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ मिलेगा। उन्होंने
एहतियातन स्वास्थ्य जांच पर कर छूट को बढ़ाने की भी मांग सरकार से की।
हेल्थकेयर
एट होम के सह-संस्थापक विवेक श्रीवास्तव ने कहा कि दूसरे और तीसरे स्तर के
शहरों में अस्पतालों में बिस्तरों की कमी को देखते हुए सरकार को घर पर
चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने को देश में स्वास्थ्य सुविधाओं का अहम हिस्सा
बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि डॉक्टरों और बुनियादी ढांचे की कमी को देखते
हुए भी घर पर स्वास्थ्य सुविधाएं देकर अस्पतालों के बोझ को कम किया जा सकता
है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय और प्रदेश स्तरीय स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के
दायरे में शामिल करने का आग्रह भी सरकार से किया।
स्वास्थ्य
क्षेत्र से संबंधित मोबाइल एप डॉक्टर इंस्टा के संस्थापक अमित मुंजाल ने
कहा कि भारत में दूरचिकित्सा या टेलीमेडिसिन बाजार में बढ़ोतरी हुई है।
इसमें सुदूर और ग्रामीण स्थानों पर विश्वस्तरीय क्लिनिकल और चिकित्सा
सेवाएं प्रदान करने की क्षमता है और उन बड़े शहरों में लोग इससे लाभ उठा
सकते हैं जहां लोगों के पास सीमित समय है। उन्होंने कहा कि सरकार और निजी
क्षेत्र इस दिशा में काम कर रहा है लेकिन बुनियादी संरचना संबंधी रुकावटें
हैं और सरकार को इस पर ध्यान देने की जरूरत है।