सोनभद्र गोलीकांड की घटना को लेकर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी
के सियासी तेवरों ने कांग्रेस में जान फूंकने का काम किया ऐसा लगता है।
लेकिन बड़ा सवाल ये है कि जिस तरह भट्टा-परसौल में राहुल गांधी ने किसानों
पर हुए गोलीकांड का विरोध कर अपनी राजनीति की जमीन तैयार की थी क्या उसी
तरह प्रियंका भी सोनभद्र को लेकर सियासत कर रही हैं? ये सवाल इसलिए क्योंकि
कांग्रेस महासचिव ने सोनभद्र गोलीकांड को लेकर योगी सरकार पर न सिर्फ जमकर
निशाना साधा बल्कि उन्होंने सोनभद्र के पीड़ित परिवार से मिलने की भी
कोशिश की।
बुधवार को सोनभद्र में हुए गोलीकांड ने उत्तर प्रदेश की सियासत को
चिंगारी दे दी है। गोली चली सोनभद्र में लेकिन गूंज दिल्ली तक पहुंची।
कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी ने तुरंत ही उत्तर प्रदेश का रुख किया।
सोनभद्र हत्याकांड के पीड़ितों से मिलने जा रहीं कांग्रेस महासचिव
प्रियंका गांधी के काफीले को शुक्रवार को रोक दिया गया। वह तब से ही इस बात
को लेकर अड़ गईं की वह पीड़ित परिवार से मिले बिना यहां से वापस नहीं
जाएंगी और फिर क्या था सियासत तेज हो गई। आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हो
गया।
जमीन विवाद में सोनभद्र में 10 लोगों की हत्या के बाद प्रियंका गांधी
पीड़ित परिवारों से मिलने के लिए वहां जा रही थीं। इससे पहले प्रियंका
गांधी ने वाराणसी के ट्रामा सेंटर में सोनभद्र की घटना में घायलों से
मुलाकात की। लेकिन यहां प्रियंका के तेवर थोड़े बदले नजर आ रहे थे। वह
बार-बार इस बात का जिक्र कर रही थी कि किस कानून के तहत उन्हें सोनभद्र में
पीड़ित लोगों से मिलने जाने से रोका गया। इसका जवाब दे दिया जाए। वह वहीं
से कार्यकर्ताओं को संबोधित भी करने लगी। मतलब साफ था नरसंहार की इस घटना
पर सियासत आम हो गई। वहीं दूसरी तरफ सोनभद्र आनेवाले टीएमसी के नेताओं को
भी वाराणसी एयरपोर्ट पर ही रोक लिया गया।
सोनभद्र नरसंहार में मारे गए दस लोगों के परिवार के सदस्यों से मिलने की
जिद पर अड़ीं कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा एक बार
फिर चुनार गेस्ट हाउस के बाहर धरना पर बैठ गईं। लगातार 24 घंटे बाद भी
प्रियंका गांधी की जिद्द को देखते हुए प्रशासन ने सोनभद्र नरसंहार के चार
पीड़ित परिवार की महिलाओं को चुनार किला के गेस्ट हाउस में बुलाया।
चुनार किला के गेस्ट हाउस के बाहर प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ
कांग्रेस के नेताओं के धरना के बीच में ही गेस्ट हाउस में पीड़ित परिवार की
महिलाओं को लाया गया। चार महिलाओं के साथ पुरुष भी आए। इन सभी से प्रियंका
गांधी से भेंट की।
इनसे सोनभद्र कांड के बारे में उन्होंने काफी कुछ जानना चाहा। चुनार
गेस्ट हाउस के बगीचे में पीड़ित परिवार की महिलाओं ने प्रियंका गांधी को
देखते ही रोना शुरू कर दिया। प्रियंका गांधी से पीड़ित परिवार के लोग मिले
तो उनका रो-रोकर बुरा हाल था। प्रियंका ने सबको सांत्वना दी। इस दौरान
प्रियंका भावुक हो गईं। उन्होंने महिलाओं से बातचीत की और उन्हें पानी पीने
के लिए कहा। मुलाकात के बाद प्रियंका गांधी ने ट्वीट करके योगी सरकार पर
निशाना साधा। प्रियंका ने कहा कि क्या इन आंसुओं को पोंछना अपराध है।
प्रियंका ने जिला प्रशासन पर आरोप लगाया कि 15 पीड़ित परिवारों की मुझसे
मुलाकात नहीं कराई सिर्फ 2 लोगों को मुझसे मिलाया गया। प्रियंका ने कहा कि
पीड़ित परिवारों को गेट के बाहर ही रोका गया। प्रियंका ने कहा कि यूपी में
संवेदनाओं की मौत का खौफ पसरा हुआ है। पीड़ित परिवार के लोगों से मिलने के
बाद प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा कि राहुल गांधी ने मुझे पीड़ित परिवारों
से मिलने को कहा था। वो मेरे नेता हैं और उनके निर्देश पर मैं यहां आई हूं।
ऐसे में यह सोचना भी जरूरी है कि क्या उत्तर प्रदेश में सियासी जमीन खो
चुकी कांग्रेस को जिंदा करने के लिए के लिए प्रियंका इसे भट्टा पारसौल वाली
घटना की तरह भुनाने की कवायद में तो नहीं लग गई हैं। क्योंकि 2012 में भी
यूपी चुनाव में कांग्रेस की सियासी जमीन मजबूत करने के लिए 2011 में हुए
भट्टा पारसौल कांड के बाद मायावती सरकार के खिलाफ इसी तरह की सियासत करने
राहुल गांधी भी गांव वालों के बीच पहुंचे थे। तब राज्य में मायावती की
सरकार थी और राहुल गांधी को तब हिरासत में ले लिया गया था। ठीक उसी तरह
जैसे अभी प्रियंका गांधी को हिरासत में लिया गया है। लेकिन राहुल की इस
कोशिश के बाद भी कांग्रेस की जमीन उत्तर प्रदेश में मजबूत नहीं हो पाई।
2012 के चुनाव में राज्य की सत्ता से जनता ने मायावती की सरकार को तो बेदखल
कर दिया लेकिन बड़ी बहुमत के साथ वहां समाजवादी पार्टी की सरकार बन गई और
इस पार्टी की अगुवाई तब पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव
को सौंपा गया। कांग्रेस इसके बाद 2017 में एक बार फिर उत्तर प्रदेश में
अपनी सियासी जमीन तलाशने की जुगत में सपा के साथ गठबंधन कर चुनाव में तो
उतरी लेकिन नतीजा फिर उनके विपरित रहा। कांग्रेस के साथ ही सपा का भी लगभग
सफाया हीं राज्य से हो गया। भाजपा ने बड़े बहुमत के साथ सरकार का गठन किया
और योगी आदित्यनाथ को भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी
गई। अब योगी राज में बुधवार को सोनभद्र में जो नरसंहार हुआ उसमें कांग्रेस
एक बार फिर से अपनी सियासी जमीन को उत्तर प्रदेश में मजबूत करने की जुगत
में लगी है। लेकिन इस बार इसके केंद्र में राहुल गांधी नहीं बल्कि प्रियंका
गांधी हैं।
भट्टा पारसौल और सोनभद्र कांड में जो सबसे बड़ी विषमता है जिसे समझना
जरूरी है वह यह है कि भट्टा पारसौल में हुए नरसंहार में संघर्ष पुलिस और
स्थानीय किसानों के बीच का था जिसमें प्रशासन की लापरवाही को नजरअंदाज नहीं
किया जा सकता था। लेकिन सोनभद्र में हुए इस नरसंहार में दो गुटों के बीच
का मामला था जिसने नरसंहार का रूप ले लिया। राज्य की सरकार तुरंत एक्शन में
आई और कई अधिकारियों पर सीधी कार्रवाई कर दी गई। सरकार ने वहां कानून
व्यवस्था को बेहतर बनाए रखने के लिए पूरे इलाके में धारा 144 भी लगा दी।
लेकिन इस सब के बाद भी प्रियंका गांधी इस बात पर अड़ गईं की उन्हें इलाके
में जाकर वहां पीड़ितों से मिलना है। मतलब साफ था कि अब इसपर सियासत तेज
होनी थी। जिसे लेकर प्रशासन ने अपनी सक्रियता दिखाई और इस मामले में सरकार
की सक्रियता ने इस नरसंहार के बाद भी इलाके में शांति स्थापित करने के
प्रयास को बल दिया।
क्या था भट्टा पारसौल कांड, क्या है इसका इतिहास
7 मई 2011 को भट्टा-पारसौल गांव में जमीन अधिग्रहण के विरोध में पुलिस
और किसानों के बीच हिंसक संघर्ष में दो किसान और दो पुलिसकर्मियों की जान
चली गई थी। तब उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार थी और उसकी अगुवाई कर रही थी
मायावती। इस नरसंहार में वहां के तत्कालीन डीएम दीपक अग्रवाल के पैर में
गोली तक लगी थी और किसानों पर मुकदमे भी दर्ज हुए। इस घटना के बाद भी आज तक
किसानों को जमीन का उचित मुआवजा तक नहीं मिला है और न्याय पाने के लिए
मजबूरी में किसान अदालत की शरण में गए। इस दौरान दो सरकारें बदली और
ग्रामीणों ने अपना चैन-सुख और नींद तक गवां दी मगर हालात आज भी ऐसे ही हैं।
इस घटना का बीज तब बोया गया जब साल 2009 में किसानों की जमीन को
धारा-चार और छह तथा नौ की कार्रवाई करके प्राधिकरण ने अधिग्रहण कर लिया
गया। किसानों की जमीन पर आबादी है या नहीं इसका भी ध्यान नहीं रखा गया और
वातानुकूलित आफिसों में बैठकर ही सेटेलाइट सर्वे कर लिया गया। जब किसानों
को पता चला कि उनकी आबादियों तक को अधिग्रहीत कर लिया है तो वह गुस्सा गए
और 17 जनवरी 2011 से आंदोलन की नींव पड़ी। इसके बाद तो आंदोलन उग्र होता
चला गया। किसान नेता मनवीर तेवतिया के नेतृत्व में भट्टा गांव में किसान
आंदोलन कर रहे थे और यह आंदोलन हिंसक रूप ले गया।
सात मई 2011 को पुलिस और किसान आमने-सामने भिड़ गए और जमकर गोलियां
चलीं। खूनी संघर्ष में किसान राजपाल, राजवीर और पुलिस कर्मी मनोज और मनोहर
की गोली लगने से मौत हो गई। वहीं तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक अग्रवाल के पैर
में गोली लग गई। डीएम समेत साठ से अधिक लोग घायल हुए थे। मामले में पुलिस,
प्रशासन और रेलवे ने किसानों पर 12 मुकदमे दर्ज कराए। जिनमें से सात
मुकदमों को प्रदेश सरकार ने वापस कर लिया। पांच मुकदमें अभी भी चल रहे हैं।
कैसे राहुल गांधी ने भट्टा पारसौल को बना लिया था अपना राजनीतिक अखाड़ा
12 मई 2011 का वो दिन आपको याद होगा जब कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी
ने उत्तर प्रदेश में 2012 को होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक
बिगुल फूंक दिया। लखनऊ तक पहुंचने का ये रास्ता ग्रेटर नोएडा के भट्टा
परसौल गांव से शुरू हुआ। राहुल गांधी सुबह अंधेरे ही गांव में पहुंच गए और
लोगों के जख्मों पर मरहम लगाया। मरहम लगाने का ये अंदाज भी किसी हुंकार से
कम नहीं था। इसके बाद ये नाटकीय घटनाक्रम चलता रहा और ठीक उसी राता
उत्तरप्रदेश पुलिस ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को गिरफ्तार कर लिया।
गांधी ने किसानों के आंदोलन के केंद्र भट्टा परसौल गांव में करीब 19
घंटे बिताए। उन्हें आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 151 के तहत
गिरफ्तार कर लिया गया। अमेठी से तब के तत्कालीन सांसद और कांग्रेस महासचिव
राहुल गांधी को भट्टा पारसौल गांव स्थित धरनास्थल से भूरे रंग की टाटा
सफारी में अज्ञात स्थान पर ले जाया गया। इसके बाद देर रात लखनउ में हुए
संवाददाता सम्मेलन में उत्तरप्रदेश के कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने कहा
कि गांधी को गुरुवार को राज्य की सीमा के बाहर छोड़ दिया जाएगा। उन्होंने
दावा किया था कि भट्टा परसौला में हालात शांतिपूर्ण हैं, लेकिन वहां माहौल
बिगाड़ने की कोशिश की गई। तब कांग्रेस ने इस गिरफ्तारी के लिए तुरंत
मायावती सरकार को आड़े हाथ लिया। कांग्रेस महासचिव जर्नादन द्विवेदी ने कहा
था कि उत्तरप्रदेश में क्रूरतम शासन देखने को मिल रहा है। उन्होंने कहा था
कि राहुल गांधी को गिरफ्तार करने की उत्तरप्रदेश सरकार की कार्रवाई यह
साबित करती है कि मायावती (सरकार) खुद की कब्र खोद रही हैं। द्विवेदी ने
कहा कि अगर सरकार में न्याय की जरा सी भी भावना बची है तो राज्य को कम से
कम न्यायिक जांच के तुरंत आदेश देने चाहिए।
आपको जानकर हैरानी होगी की भट्टा-पारसौल में राहुल गांधी जिस तरह से
किसानों के बीच पहुंचे थे वह सच में आश्चर्यजनक था। उस दिन सुबह स्थानीय
पुलिस को चकमा देते हुए मोटरसाइकिल पर सवार होकर आंदोलन के केंद्र बने गांव
तक राहुल गांधी पहुंच गए थे। उस समय प्रशासन ने राहुल को सुरक्षा देने में
असमर्थता भी जताई थी क्योंकि वह बिना इत्तला दिए आए थे। इसके बाद राहुल ने
अधिकारी से कहा था कि जब तक मांगें पूरी नहीं हो जातीं, वे गांव छोड़कर
नहीं जाएंगे। इस पूरे मामले में सनसनी तब फैल गई जब भट्टा पारसौल गांव में
तैनात बड़ी संख्या में पुलिस के जवान अंधेरे में इस गांव में पहुंचे राहुल
को नहीं देख सके। राहुल ने जब किसानों से मिलना और उनकी बात सुनना शुरू कर
दिया, तब पुलिसकर्मी राहुल को पहचान सके थे।
क्यों सजने लगी थी भट्टा पारसौल में राजनीतिक मंचें
दरअसल, भट्टा पारसौल गांव 2011 में चर्चा में आया था। उस समय प्रदेश में
मायावती का सरकार थी। जमीन अधिग्रहण के विरोध में किसान आंदोलन कर रहे थे।
इसी दौरान सात मई 2011 को पुलिस और किसानों में खूनी संघर्ष हो गया। इसमें
दो किसान और दो पुलिस जवानों की मौत हो गई थी। इसके बाद समूचे प्रदेश में
भूचाल आ गया था। राजनीति दलों ने गांव की तरफ कूच करना शुरू कर दिया था।
प्रदेश सरकार ने राजनीतिक दलों के गांव में पहुंचने पर रोक लगा दी थी। 11
मई को अचानक राहुल गांधी मोटर साइकिल पर सवार होकर गांव पहुंच गए। दिनभर
गांव में राहुल जमे रहे थे। इसके बाद उन्होंने भट्टा पारसौल से अलीगढ़ तक
पदयात्रा कर जमीन अधिग्रहण के खिलाफ माहौल तैयार किया। राहुल गांधी के
प्रयासों के बाद तत्कालीन कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार अंग्रेजों के
जमाने के कानून में बदलाव के लिए तैयार हुई थी।
भट्टा-पारसौल में मिट्टी ढोते दिखे थे राहुल
साल 2011 में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए-2 की सरकार के दो साल हो
चुके थे। इन दो साल में सरकार के कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग
चुके थे। जनता के बीच कांग्रेस की छवि धुमिल होने लगी थी। उसी दौरान दिल्ली
से सटे ग्रेटर नोएडा में जमीन अधिग्रहण के उचित दाम नहीं मिलने को लेकर
किसान आंदोलन कर रहे थे। एक साल बाद यानी 2012 में उत्तर प्रदेश में
विधानसभा चुनाव भी होने थे। इस मौके पर कांग्रेस को किसान हितैषी दिखाने की
इरादे से राहुल गांधी अचानक तड़के बाइक से ग्रेटर नोएडा के भट्टा-पारसौल
पहुंच गए। यहां वे किसानों के साथ मिट्टी ढोते हुए दिखे थे। उनकी यह तस्वीर
मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर लंबे समय तक छाई रही। इस दौरान राहुल गांधी
16 किलोमीटर तक पैदल भी चले थे।
सियासत क्या ना करा दे, राहुल गांधी भट्टा-पारसौल से निकाली यात्रा में नहीं हुए शामिल
उत्तर प्रदेश में अपनी जड़ फिर से मजबूत करने की जुगत में लगी कांग्रेस को
पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने तब झटका दे दिया। जब 13 मार्च 2015 को
जमीन अधिग्रहण बिल के बहाने भट्टा पारसौल गांव से दिल्ली के लिए कांग्रेस
की तरफ से निकाली गई पदयात्रा में राहुल गांधी ही शामिल नहीं हुए। पहले
इसमें राहुल गांधी के आने की संभावना थी, लेकिन ऐन वक्त पर राहुल गांधी ने
पार्टी को झटका देते हुए पदयात्रा से दूरी बना ली। कांग्रेस उपाध्यक्ष
राहुल गांधी की गैरमौजूदगी में यात्रा की अगुवाई पूर्व केंद्रीय मंत्री
जयराम रमेश ने की। मतलब साफ था कि राहुल को जब अपनी सियासी जमीन इस मामले
को उठाकर भी उत्तर प्रदेश में मजबूत होती नहीं दिखी तो उन्होंने इस पर
विचार करना ही छोड़ दिया। स्पष्ट हो गया था कि राहुल गांधी को किसानों की
नहीं बल्कि कांग्रेस की चिंता सताए जा रही थी।
भट्टा पारसौल में राहुल को बाइक पर ले जाने वाला जब भाजपा में हुआ शामिल
2017 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनावों की तैयारियों के बीच भाजपा ने
कांग्रेस को तगड़ा झटका दिया था। प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या ने
गौतमबुद्ध नगर में कांग्रेस के प्रभावशाली नेता माने जाने वाले ठाकुर
धीरेंद्र सिंह को भाजपा की सदस्यता दिला दी थी। धीरेंद्र सिंह वही थे,
जिन्होंने भट्टा पारसौल गांवों में अधिग्रहण को लेकर मचे बवाल के दौरान
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को बाइक पर बिठाकर मौके पर पहुंच गए थे।
मंदसौर में भी भट्टा पारसौल की याद ताजा करा दी थी राहुल गांधी ने…
जून 2017 को मंदसौर में पीड़ित किसानों से मिलने जाते समय राहुल ने एक
बार फिर से 2011 के उत्तर प्रदेश भट्टा पारसौल प्रकरण की याद दिला दी थी।
पुलिस फायरिंग में मारे गए जिले के पांच किसानों के परिजनों से मिलने जा
रहे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी सहित पार्टी के अन्य नेताओं ने
राजस्थान से जैसे ही मध्य प्रदेश में प्रवेश किया उन्हें हिरासत में ले
लिया गया था। बाद में सभी को जमानत पर रिहा कर दिया गया था। काफी हंगामे के
बाद लौटते समय पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन ने मृत किसानों के परिजनों से
राहुल गांधी की मुलाकात कराई थी।
मंदसौर पहुंचने के लिए भी राहुल ने कुछ ऐसा ही हथकंडा अपनाया था। इंदौर
के राऊ विधायक जीतू पटवारी के साथ बाइक पर सवार राहुल गांधी गुरुवार दोपहर
नयागांव पहुंचे थे। करीब एक हजार लोगों के साथ मध्य प्रदेश की सीमा में
प्रवेश करने के बाद पुलिस ने उन्हें शांतिभंग के आरोप में गिरफ्तार कर लिया
था। इसके पहले कांग्रेस नेता कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, सचिन पायलट और जदयू
नेता शरद यादव ने भी गिरफ्तारी दी थी।
इससे पहले पुलिस को चकमा देने के लिए राहुल खेतों की ओर भागे थे, जहां
मधुमक्खियों के कारण अफरा-तफरी मच गई थे। राहुल सहित कांग्रेस नेताओं को
ग्राम खोर स्थित एक रेस्ट हाउस में रखा गया था। जहां से राहुल सहित सभी को
जमानत पर छोड़ दिया गया था, लेकिन उन्हें मंदसौर की ओर नहीं जाने दिया गया
था। बाद में राहुल ने निम्बाहेड़ा क्षेत्र स्थित निंदवा गांव में मृतकों के
परिजनों से मुलाकात की थी।
राहुल गांधी के इस सियासी सफरनामे पर गौर करें तो आपको साफ पता चल जाएगा
की राहुल के लिए या कांग्रेस के लिए कभी भी किसान हित इस सभी प्रकरणों में
कहीं भी सामने नहीं था। उनकी सिर्फ और सिर्फ एक ही सोच इन सारे प्रकरणों
में कॉमन थी और वह था मीडिया का अटेंशन हासिल करना और कांग्रेस के लिए इन
राज्यों में राजनीतिक जमीन तैयार करना साथ ही पार्टी की खो चुकी साख को इन
राज्यों में किसानों के जरिए हासिल करना। हालांकि इस पूरे प्रकरण में राहुल
पूरी तरह से विफल रहे। अब प्रियंका भी कुछ ऐसा ही करने का जुनून लेकर
सोनभद्र नरसंहार के बाद वहां पहुंचने की कोशिश में तो जुट गईं। लेकिन
उन्हें उससे पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया और और अंततः उनकी मंशा तब और
स्पष्ट हो गई जब उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के बाद कार्यकर्ताओं को संबोधित
करना शुरू कर दिया।
मतलब इस बार फिर साफ संकेत थे कि यह केवल सियासी ड्रामा था और इससे
ज्यादा कुछ नहीं। क्योंकि कांग्रेस को समाजवादी पार्टी गठबंधन की गाड़ी से
पहले ही उतार चुकी है। मायावती खुलकर कांग्रेस का विरोध करती रही हैं। जो
हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में यूपी में कांग्रेस की फजीहत की वजह भी बन
चुका है। राहुल गांधी अमेठी से अपनी पारिवारिक सीट तक नहीं बचा पाए। वहीं
राज्य में भाजपा की सरकार है। जो हमेशा से कांग्रेस की सबसे बड़ी
प्रतिद्वंदी पार्टी रही है। ऐसे में प्रियंका को उत्तर प्रदेश की राजनीति
में फिट कराने और पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश में सियासी जमीन को मजबूत
करने की जो कोशिश थी वह एक बार फिर से धाराशायी होती नजर आ रही है।