रामराज की जगह रामराज्य की स्थापना का संदेश देती है आशुतोष राणा की किताब ‘रामराज्य’

राम का नाम आते ही रामायण का ध्यान आ जाता है. मन में या तो रामभक्ति हिलोरें लेने लगती है या फिर रामकथा की किताबों में लिखे गए प्रसंगों पर सवालों के पहाड़ खड़े हो जाते हैं. राम ऐसे थे, रावण वैसा था. सब कैकेयी का किया-कराया है. शूर्पनखा कैसी थी? सोने का मृग कैसे हो सकता है? कैसे राम ने पंचवटी में रह कर सेना एकत्र की? कैसे कुंभकर्ण इतना लंबा-चौड़ा हो सकता है? कैसे रामजी ने उसे हराया? या फिर हनुमान जी इतने बलवान कैसे थे? विभीषण ने ठीक किया या गलत किया? कोई पुरानी किताबों में लिखी सारी बातों को बस मान लेने को कहता है, तो बहुत से लोग अपनी मति-बुद्धि के अनुरूप प्रसंगों पर प्रकाश डालते हैं. उसे मथते हैं. जो निकाल भी पाते हैं उसे ही सभी को मानने के लिए कहते हैं.

रामराज की जगह रामराज्य की स्थापना का संदेश देती है आशुतोष राणा की किताब ‘रामराज्य’

कैकेयी की कथा
अभिनय की दुनिया में अपनी पहचान कायम करने वाले आशुतोष राणा ने रामकथा से जुड़े मिथकों, संकेतों और सवालों को एक नए तरीके से उठाया है. उनकी किताब “रामराज्य” में बहुत से रूढ़ विषयों को अलग तरीके से छूने की कोशिश की गई है. जगत में कुमाता की पर्याय बन चुकी कैकेयी के चरित्र को बिल्कुल ही अलग तरीके से देखने का प्रयास किया गया है. आशुतोष की पुस्तक में माता कौशल्या राम के वन चले जाने के बाद अज्ञातवास में चले गए शत्रुघ्न को खोजते हुए कहती हैं- “ये चारों बच्चे अपनी मां की कोख से अधिक महारानी कैकेयी की गोद को मान देते हैं. हम तो मात्र उनको जन्म देने का आधार हैं किंतु कैकेयी उनके जीवन की निर्माता है.” यानी कौशल्या भी मानती हैं कि चारों भाई सबसे ज्यादा कैकेयी को प्रेम करते रहे.

अखंड आस्था


माता कैकेयी के चरित्र का जिक्र करते समय आशुतोष बालक राम की प्रवृत्ति की छवि के प्रति बहुत सतर्क दिखाते हैं. कैकेयी शीर्षक के पहले अध्याय में वे लिखते हैं कि कैसे माता कैकेयी के कहने के बाद भी भरत मात्र अभ्यास के लिए चिड़िया को मारने से मना कर देते हैं, जबकि राम निशाना लगाने में जरा भी नहीं सोचते. यहां आशुतोष के राम कहते हैं- “मां मेरे लिए किसी के भी जीवन से महत्वपूर्ण है माता की आज्ञा.” इस तरह से लेखक शुरुआत से ध्यान रखता है कि उसके चरित्र मजबूत रहें, लेकिन किसी का रंग इतना असरदार न हो कि वो पाठकों पर राम से ज्यादा चढ़ जाए. आशुतोष एक नयी स्थापना लेकर आते हैं कि कैकेयी राम के आग्रह पर ही उनके वन जाने और भरत के राजतिलक का वरदान मांगती हैं. वैसे आस्था वालों को ये तर्क चौंकाता नहीं है, क्योंकि है तो सब मायापति की माया ही- “तसि मति फिरी अहई जस भाबी.....”

फ्लैशबैक का बेहतरीन प्रयोग
कैकयी की अंतरव्यथा और फ्लैशबैक में उसकी स्मतियों का उल्लेख कर कथा को और रोचक बना दिया है. लेखक ने गंभीरता से दिखाया है कि कैसे माता ने संतानों में उदात्त संस्कारों का बीजारोपण कर दिव्य चरित्रों का निर्माण किया. पुस्तक में खुद राम कहते हैं –“…. जो बच्चे के चित्त, चरित्र चिंतन की अभियंता हो, ऐसी स्त्री असाधारण ही होती है. और वे सभी गुण तुममें है.”

नाक-कान कटने का मतलब
रामायण की कहानी में एक और बहुत ही विचित्र औऱ रोचक पात्र है सूपनखा या शूर्पणखा. उसका ये नाम रामायण के ग्रंथों में जैसे भी रखा गया हो, आशुतोष राणा ने अपनी किताब में इसकी बहुत ही सुंदर कैफियत दी है. रामराज्य के दूसरे अध्याय का नाम ही यही है- सूपर्णा-शूर्पणखा. इसमें उन्होंने इस चरित्र की बहुत सुंदर व्याख्या की है. माता-पिता ने नाम सुपर्णा रखा और कैसे जिद पर आने पर ये कन्या शूर्पणखा के समान व्यवहार करने लगती है. एक ही व्यक्ति के अंदर के दो चरित्र. दरअसल तुलसी बाबा ने अपनी कथा में इसे बहुत ही महत्वपूर्ण चरित्र के रूप में रचा है - सूपनखा के तौर पर. ऐसा चरित्र जिसके नाखून बहुत बड़े हों. सूप की तरह हों. नाखून वो अंग होते हैं, जिनका होना जरूरी है. लेकिन उन्हें काटना भी पड़ता है. अगर नाखूनों को कामनाओं या वासनाओं के प्रतीक के तौर पर मान लिया जाये, तो बहुत ही अच्छी व्याख्या आती है कि कामनाएं होनी तो चाहिए किंतु इतनी भी नहीं कि उनके कारण नाक और कान ही काट दिए जाएं.



शूर्पणखा के जरिए संदेश
आशुतोष राणा ने इस चरित्र के साथ पूरा न्याय करते हुए इसे बहुत सशक्त रूप दिया है. साथ ही ‘बेटे’ को सबसे बड़ी उपलब्धि मानने वाले समाज को भी महत्वपूर्ण संदेश दिया है. आशुतोष की किताब रामराज्य में शूर्पणखा के पिता ही उससे आग्रह करते हैं –“मैं चाहता हूं कि इस बार पुत्र नहीं, मेरी पुत्री सुपर्णा मेरे सम्पूर्ण वंश के तारण का कारण बने.” पिता के इसी निर्देश पर वो जाती हैं. पंचवटी में राम -लक्ष्मण से उसकी बातचीत होती है. इस वार्तालाप में उसकी इस कदर पराजय होती है कि उसे लगता है कि लक्ष्मण ने उसके कान ही काट दिए. उसके प्रणय निवेदन को ठुकरा कर दोनों भाइयों ने उसकी नाक भी काट दी. जैसा कि मुहावरे में कहा जाता है.

अंहकार पर प्रहार
बस यहीं से उसे अपने पिता के आदेश का पालन करने का मौका मिल जाता है. फिर वो रावण के सामने ऐसा मेकअप करके जाती है कि सही में राम-लखन ने उसके नाक-कान काट दिए हों. दरअसल वो रावण के अहंकार को चुनौती देती है. आशुतोष लिखते हैं – “अहंकारी व्यक्ति से अपना मनोवांछित फल प्राप्त करना कितना सरल होता है! उसके अहंकार पर चोट पड़ते ही उसकी बुद्धि भ्रमयुक्त हो जाती है और भ्रमित व्यक्ति तब वह करने लगता है जो सामने वाला चाहता है.” इसी का फायदा उठा कर सुपर्णा रावण को उकसाने में सफल हो जाती है. उसे पता है कि रावण को राम ही मुक्ति देंगे और कुल का त्राण होगा.

जन-जन के राम
इसी अध्याय में आशुतोष इसका विस्तार से वर्णन करते हैं कि राम पंचवटी में कैसे पददलित वनवासियों को सशक्त करते हैं. उन्हें कैसे मानव होने का बोध कराते हैं. कैसे वे सामान्य लोगों को आक्रांताओं के विरुद्ध खड़ा कर देते हैं. ये रामराज्य का बहुत ही सुंदर पक्ष है.

रावण-मंदोदरी संवाद में नीति
अपने अध्याय ‘लंका’ में मंदोदरी और रावण के बीच संवाद के जरिए आशुतोष बहुत ही नीतिपरक बातों को आम जीवन के लिए उपयोगी रूप में प्रस्तुत करते हैं. धर्म के अतिरिक्त स्त्री-पुरुष की स्थिति और संबंधों पर बहुत सी गूढ़ बातें बेहद सरल तरीके से यहां रखी गई हैं. हालांकि इसी संवाद में रावण अपनी बहन यानि एक स्त्री पर किए गए प्रहार को धर्म पर किया गया प्रहार साबित कर अपने अभियान को धर्म की रक्षा के लिए किया गया काम सिद्ध कर लेता है. कहता है- “....इसका अर्थ हुआ कि स्त्री के ऊपर, भूमि के ऊपर और प्रकृति के ऊपर की गयी चोट धर्म पर की गयी चोट के जैसी होगी?” इस प्रश्न के जबाव में मंदोदरी भी उसे धर्म की रक्षा के लिए आगे बढ़ने को कहती है.

हनुमान की शक्ति
पुस्तक के एक अध्याय का शीर्षक हनुमान भी है और होना ही चाहिए. रामकथा हनुमान के बिना पूरी हो ही नहीं सकती. हनुमान की बुद्धि और बल के बारे में जो धारणा है, उसे इस पूरे अध्याय में लेखक ने और पुष्ट किया है. साथ ही रामेश्वरम शिव स्थापना की कथा को पूरा स्थान दिया है. वैसे भी कई राम कथाओं में प्रचलित है कि राम विनम्रता से सिर्फ इसी बात का श्रेय लेते हैं कि उन्होंने एक काम किया शिवजी की स्थापना की, बाकी काम तो इनकी कृपा से ही हो गया.


कुंभकर्ण की कहानी
विजयपर्व नाम के अध्याय में कुंभकर्ण का उल्लेख करते हुए लेखक ने उसे रावण का वैज्ञानिक स्थापित कर दिया है. इसमें भी आशुतोष बेहद सफल रहे हैं. उनके मुताबिक कुंभकर्ण के शोधों में कोई विघ्न न पड़े इसके लिए रावण ने ये प्रचारित कर रखा है कि वो छह महीने सोता है. सोते हुए कुंभकर्ण को जगाने वाले को मृत्युदंड मिलेगा. साथ ही एक नयी स्थापना आशुतोष राणा ने ये की है कि वो एक ऐसे लोहे के वाहन में निकलता है जो बहुत विशालकाय है. हालांकि राम उसकी इस माया को पहचान लेते हैं. भले ही ये नाटकीय लगे, किंतु रोचक जरूर लगता है और आशुतोष राणा भाई विभीषण से इसकी पुष्टि भी करा लेते हैं.

साथ ही विभीषण की अन्तरव्यथा को राम के साथ वार्तालाप में बहुत ही सलीके से प्रस्तुत किया गया है. पुस्तक का अंतिम अध्याय सीता परित्याग निश्चित तौर पर बहुत ही संवेदनशील है.


प्रवाहशील भाषा और प्रभाव डालने वाले संवाद
पुस्तककार चूंकि फिल्म और रंग कर्म से जुड़े हैं, तो संवादों में एक बहुत ही रोचक प्रवाह है. कथा के अनुरुप भाषा संस्कृत की ओर झुकी हुई हिंदी वाली है. इस कारण से भी प्रभाव पैदा करने में सफल है. उदाहरण के लिए देखें- “वे इस सत्य को जानते हैं कि जब सकार और नकार एक दूसरे से लयबद्ध होकर मिलते हैं तब हमारे चित्त में ऊंकार का उदय होता है. और जब ये दोनों ऊर्जाएं एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े होकर टकराने लगती हैं तब हमारे हृदय में विकार जन्म लेता है. सत्, रज, तम की आनुपातिक संगति सृजन का घोष है, तो इनके बीच उत्पन्न होने वाली विसंगति विध्वंस की घोषणा.”

रामराज और रामराज्य
हां, खास बात ये है कि पुस्तक में कठिन लगने वाले शब्दों के अर्थ उसी पेज पर दिए गए हैं. इससे पुरानी हिंदी न समझने वालों को भी इसका रस लेने का पूरा अवसर मिलता है. बावजूद इसके कि राम के चरित्र पर इतना सारा साहित्य है, कथाएं हैं और उनसे भी अधिक लोकश्रुतियां हैं, फिर भी पुस्तक में कथा, भाषा और संदेश कुछ ऐसा है कि पढ़ कर अच्छा लगता है. पुस्तक के पहले अध्याय में ही राम के मुंह से लेखक संदेश दिला देता है कि वो रामराज नहीं, रामराज्य चाहते हैं. राम कैकेयी संवाद में वे कहते हैं –“मैं रामराज नहीं, रामराज्य को स्थापित करना चाहता हूं. जहां व्यक्ति से अधिक महत्व विचार का हो, व्यवस्था का हो. जहां प्रजा के रक्षण और पोषण का कार्य कोई व्यक्ति नहीं, अपितु विचार करते हों. प्रजा व्यक्तिपूजक नहीं, विचारपूजक हो.” इस संदेश की व्याख्या में आशुतोष सफल दिखते हैं.

दिल्ली के कौटिल्य बुक्स की ओर से प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य 500 रुपये है. आवरण और छपाई को देखकर हो सकता है ये कीमत ठीक हो, लेकिन इस तरह की पुस्तक अगर और कम मूल्य पर मिले तो ज्यादा अच्छा है. भले ही हार्ड बाइंड की जगह पेपरबैक हो.