सरकारी अस्पतालों में मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ का सिलसिला जारी

सरकारी अस्पतालों में मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ का सिलसिला जारी

हम अक्सर लिखते रहते हैं, लोगों को सस्ती और स्तरीय शिक्षा एवं चिकित्सा, स्वच्छ पानी और लगातार बिजली उपलब्ध करवाना हमारी केंद्र और राज्य सरकारों का कत्र्तव्य है परंतु इन सभी मोर्चों पर वे विफल ही रही हैं। जहां स्तरहीन शिक्षा के कारण लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाना नहीं चाहते वहीं सरकारी अस्पतालों में लापरवाही और मरीजों की उपेक्षा के कारण लोग वहां इलाज करवाना भी सुरक्षित नहीं समझते। सरकारी अस्पतालों की लापरवाही के चंद ताजा उदाहरण निम्र में दर्ज हैं :

31 अगस्त को फैजाबाद के जिला अस्पताल में पैर में गंभीर चोट से पीड़ित महिला को एमरजैंसी वार्ड में न रख कर जनरल वार्ड में रखा गया। वहां महिला तड़पती रही लेकिन किसी नर्स और डाक्टर ने उस पर ध्यान नहीं दिया और अंतत: उसके प्राण पखेरू उड़ गए। 13 सितम्बर सुबह भगत सिंह नगर होशियारपुर की महिला को सरकारी अस्पताल होशियारपुर में दाखिल करवाया गया परंतु गायनी वार्ड में संबंधित डाक्टर के न आने से प्रसव पीड़ा बढऩे पर नर्सों ने डिलीवरी करवा दी जिस दौरान अधिक रक्त बह जाने के कारण महिला की मृत्यु हो गई।

15 सितम्बर को हरियाणा के फतेहाबाद जिले में पृथाला गांव स्थित प्राइमरी हैल्थ सैंटर के प्रसूति कक्ष में बिजली अथवा वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण वहां प्रसव के लिए लाई गई एक महिला को मोटरसाइकिल की हैडलाइट की रोशनी में प्रसव करवाया गया परंतु संभवत: धुएं में दम घुटने और आक्सीजन उपलब्ध न होने के कारण बच्चे की मृत्यु हो गई। 16 सितम्बर को उत्तर प्रदेश के गोंडा में जिला अस्पताल की लापरवाही उस समय सामने आई जब अस्पताल में तैनात कर्मचारियों ने गर्भवती महिला को चैक करने के बाद उसके परिजनों से उसे बाद में लाने के लिए कह दिया लेकिन जैसे ही महिला अस्पताल से बाहर सड़क पर पहुंची उसे तेज दर्द हुआ और वह तड़प कर सड़क पर ही लेट गई जहां उसने बच्चे को जन्म दे दिया।

18 सितम्बर को मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड मैडीकल कालेज में भर्ती लावारिस मरीज ओ.पी.डी. के बाहर दर्द से कई घंटे तड़पता रहा और अंत में वहीं पड़े-पड़े उसके  प्राण निकल गए। अस्पताल का कोई स्टाफ उसकी सहायता को नहीं आया। 19 सितम्बर को सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में सिरसा के सिविल अस्पताल में ड्यूटी पर तैनात डाक्टर के उपलब्ध न होने के कारण एक प्राइवेट गार्ड को एक 20 वर्षीय एक्सीडैंट के शिकार रोगी के सिर में टांके लगाते हुए दिखाया गया। 19 सितम्बर को ही छत्तीसगढ़ में धमतरी में ‘नगरी’ के सरकारी अस्पताल में आक्सीजन नहीं मिलने से फरसिया निवासी आदिवासी युवक टिकेश्वर शांडिल्य (32) की मृत्यु हो गई। एक महीने के भीतर यह राज्य में आक्सीजन नहीं मिलने से होने वाली दूसरे रोगी की मौत है।

24 सितम्बर को मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य राज्य मंत्री शरद जैन के गृह जिले में स्थित नेता जी सुभाष चंद्र बोस मैडीकल कालेज में मदन सिंह गोंड वहां उपचाराधीन अपनी पत्नी सविता सिंह की मौत के बाद घंटों वाहन के लिए रो-रो कर गुहार लगाता रहा लेकिन अस्पताल प्रबंधन का दिल नहीं पसीजा। मदन सिंह का आरोप है कि सविता को बच्चेदानी में तकलीफ थी जिसकी जांच के बाद डाक्टरों ने आप्रेशन करना था लेकिन डाक्टरों द्वारा इलाज में लापरवाही बरतने से उसकी मौत हो गई। इसके बावजूद अस्पताल प्रबंधन का लापरवाही पूर्ण रवैया नहीं बदला तथा उसे स्ट्रेचर उपलब्ध करवाने के लिए भी वार्ड ब्वाय ने उससे 500 रुपए ले लिए।

सरकारी अस्पतालों में लापरवाही के ये तो चंद उदाहरण मात्र हैं और भी न जाने कितनी ऐसी घटनाएं हुई होंगी जो प्रकाश में नहीं आ पार्ईं। सरकारी अस्पतालों में आमतौर पर कमजोर वर्ग के लोग ही जाने को विवश होते हैं। होना तो यह चाहिए कि वहां रोगियों को प्राथमिकता के आधार पर उपचार मिले परंतु हो इसके विपरीत ही रहा है। इसे रोकने के लिए अस्पतालों में डाक्टरों की सोच-समझ कर तैनाती, उनकी समय की पाबंदी और जवाबदेही को सुनिश्चित करना तथा दोषियों को शिक्षाप्रद दंड देने की व्यवस्था करना जरूरी है ताकि सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए जाने वाले वहां से स्वास्थ्य लाभ करके लौटें।